चौपाल: ये कैसी नीति !

वाट्सऐप ने अपनी सेवा शर्तों में बदलाव की घोषणा की है। इसमें कहा गया है कि यदि इसकी नई सेवा शर्तों को पंद्रह मई तक स्वीकार नहीं किया जाता है तो ऐसी स्थिति में उपयोगकर्ता का एकाउंट बंद कर दिया जाएगा।

पहले यह बदलाव आठ फरवरी से लागू करने का फैसला किया गया था, लेकिन लोगों के विरोध को देखते हुए इस पर तीन महीने के लिए अमल टाल दिया गया। साल 2014 में फेसबुक द्वारा वाट्सऐप को खरीदने के बाद से ही फेसबुक के साथ उपयोगकतार्ओं का डेटा साझा करता आ रहा है, लेकिन अब वह ऐसा करने के लिए उपभोक्ता की जबरन सहमति चाह रहा है।

यदि वाट्सऐप ऐसा करता तो इससे सिर्फ उपभोक्ताओं को ही नहीं, अपितु वाट्सऐप को भी नुकसान होगा और उसके उपयोगकतार्ओं की संख्या में कमी आएगी। वाट्सऐप उपभोक्ताओं का आइपी पता फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी अन्य तीसरे पक्ष या देश को दे सकता है। वाट्सऐप ने भारत में तो भुगतान सेवा भी शुरू कर दी है। ऐसे में यदि उपभोक्ता इसके जरिए भुगतान करेंगे तो वाट्सऐप कुछ और निजी डेटा इकट्ठा कर सकता है जैसे खाते और भुगतान से जुड़ी जानकारियां आदि।

भारत की सर्वोच्च अदालत ने साल 2017 में “पुटुस्वामी बनाम यूनियन आॅफ इंडिया” के अपने फैसले में “निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार” करार देते हुए इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत “जीवन के अधिकार” के रूप में वर्णित किया है। ऐसे में वाट्सऐप की नई सेवा शर्तें भारतीयों की निजता के हनन के साथ-साथ भारत सरकार के कानूनों का भी उल्लंघन करता है।

भारतीय आइटी एक्ट-2000 की धारा-1 और धारा-75 के अनुसार अगर कोई सेवा प्रदाता भारत के बाहर स्थित है, लेकिन भारत में उसकी सेवाएं कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर उपलब्ध हैं तो वह सेवा प्रदाता भारतीय कानून के अधीन माना जाएगा। ऐसे में वाट्सऐप भी भारत के आइटी कानून के अंर्तगत आता है, लेकिन ये भारतीय कानून उतने प्रभावी नहीं हैं जितने कि अन्य देशों के कानून जैसे- यूरोपीय संघ, ब्राजील और अमेरिका में हैं।

इन देशों ने स्थानीय कानूनों के तहत वाट्सऐप की अलग-अलग नीतियां और शर्तें बना रखी हैं। ऐसे में निजता की सुरक्षा के लिए भारतीय आइटी कानून के प्रावधानों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है, जिससे वर्तमान और भविष्य में किसी भी सेवा प्रदाता द्वारा लोगों की निजता से किसी भी प्रकार का छेड़छाड़ न किया जा सके।
’अनुज कुमार शर्मा, जौनपुर (उप्र)

कृषि कानून के पेंच

आज किसान किसी की भी बात मानने के लिए तैयार नहीं हैं। आखिर क्यों? अगर कृषि कानूनों में सारे प्रावधान किसानों के पक्ष में है तो फिर इस तकरार की वजह क्या है? किसानों को अपने उत्पादों को किसी भी प्रदेश में ले जाकर बेचने की सुविधा है। उन्हें यह भी जबरदस्ती नहीं है कि केवल मंडियों में ही अपने उत्पादों को बेचें।

ऐसे में सवाल यही उठता है कि किसानों के इस आंदोलन की वास्तविक वजह क्या है? असल समस्या कृषि क्षेत्र में निवेश की है। अधिकतर किसान संगठनों की राय है कि नए कृषि कानूनों से कारपोरेट और बड़े व्यापारी किसानों का तेजी से शोषण शुरू कर देंगे और उनकी उपज को फसल के मौके पर औने-पौने दामों में खरीद कर बाद में ऊंची दामों पर बेच कर भारी मुनाफा कमाएंगे।

नए कानून में उपज के भंडारण की कोई सीमा नहीं रहेगी जिसकी वजह से व्यापारी वर्ग नई फसल आने पर अपने गोदामों में भरा हुआ माल बाजार में लाकर किसानों को उपज का मूल्य नीचे रखने के लिए मजबूर करेंगे। इन्हीं सब कारणों से किसानों की यह मुख्य मांग है कि उनकी उपज का न्यू समर्थन मूल्य संवैधानिक दायरे में आए और इससे नीचे भाव पर उपज खरीदने वाले के लिए दंड का प्रावधान हो। चूंकि कृषि प्रदेशों का विषय है, इस कारण किसानों का पक्ष मजबूत दिखता है।

लेकिन यहां सरकार की भिन्न राय है। सरकार का फैसला कृषि नीति के अनुरूप है। इन कानूनों के लागू होने से देश और कृषि क्षेत्र की दशा बदलेगी और निजी निवेश आने से किसानों की माली हालत ठीक होगी और यह ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि जगत में कृषि उत्पादों से संबंधित कृषि औद्योगिकीकरण का नए युग का प्रारंभ होगा जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी का सृजन एक अनमोल उपहार को लेकर आएगा जैसा कि औद्योगिक क्रांति के समय हुआ था।
’अशोक कुमार, पटना

नई पीढ़ी का संकट

आज के समय में सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। अगर हम कुछ समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल न करें तो ऐसा लगता है कि हमने आज कुछ खो दिया। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पल भर के लिए भी सोशल मीडिया से दूर नहीं रह सकते। वे पूरी तरह से इस पर निर्भर हैं।

सोशल मीडिया के बढ़ते चलन से युवा पीढ़ी में सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की भी कमी देखने को मिल रही है। फिलहाल देश दुनिया में आए दिन कुछ न कुछ घटनाएं घटित होती रहती हैं और सोशल मीडिया के जरिए हर जगह फैलती हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटों के माध्यम से अश्लील और भड़काऊ सामग्री का प्रसारण एक बड़े संकट के रूप में सामने आया है।

ऐसे में क्या हमें सोशल मीडिया के उपयोग की एक समय सीमा तय नहीं करनी चाहिए? सोशल साइट पर कई बार स्टेटस अपडेट करना, घंटों तक दोस्तों से चैटिंग करना जैसी आदतों ने युवा पीढ़ी को काफी हद तक प्रभावित किया है। घंटों तक ट्विटर और फेसबुक जैसी वेबसाइट पर समय बिताने से न केवल उनकी पढ़ाई पर असर पड़ा है, बल्कि धीरे-धीरे कुछ नया करने की रचनात्मकता भी खत्म हो रही है।
’रूबी सिंह, गोरखपुर

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