हिंदी सिनेमा का लोक

लोक की पूरी बनावट लयदार है। यहां न तो कुछ कर्कश है और न ही कुछ तुच्छ।

सिन्‍धु कुमारी

लोक की पूरी बनावट लयदार है। यहां न तो कुछ कर्कश है और न ही कुछ तुच्छ। आस्था और परंपरा के तटों से टकराती लोकगीतों की धारा ने सिनेमा और समाज को किस तरह प्रभावित किया है, यह देखना-समझना खासा दिलचस्प है। खासतौर पर हिंदी सिनेमा ने जिस तरह लोक टेरों को अपनाया है, वह कलात्मक प्रयोग का बड़ा आयाम तो है ही, यह संस्कृति और अभिव्यक्ति के लिहाज से भी लाजवाब प्रयोग है।

बीसवीं सदी से लेकर अब तक जिस कला ने कम समय में सबसे ज्यादा असर हमारे जीवन पर डाला है, हम कह सकते हैं कि वह सिनेमा है। फिल्मों से हमारे क्रिया-कलाप और जीवन व्यापार कितने अधिक प्रभावित हुए हैं, इस बारे में अलग से कुछ कहने की जरूरत नहीं है। सिनेमा की इस दुनिया का जीवन, परंपरा और संस्कृति सब पर ही खासा असर देखा जा सकता है। खासतौर पर लोकगीतों ने फिल्मों पर जिस तरह असर डाला है, वह अपने आप में एक बड़ा सांगीतिक उल्लेख है। ‘लोक’ शब्द का मूल अर्थ होता है- देखने वाला। ऋग्वेद में ‘लोक’ शब्द ‘जन’ के पर्याय के तौर पर प्रयोग में आया है। लोक के सांस्कृतिक पक्ष को जब समाज और परंपरा के गाढ़ेपन के बीच देखते-समझते हैं तो हमारा परिचय लोकगीतों के भरे-पूरे संसार से होता है। लोकगीतों के इस संसार ने जहां हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक बड़ा आधार दिया, वहीं सुगम संगीत और फिल्मों में इनके चलन का दौर आज तक नए-नए प्रयोगों के साथ जारी है।

लोकमानस की अभिव्यक्ति
लोकगीतों के लिए हम आधारभूत तौर पर कह सकते हैं कि यह लोकमानस की सहज लयात्मक अभिव्यक्ति है, जो लोक की स्वेच्छा एवं स्वत: स्फूर्तिजन्य व लोक-जीवन का प्रतिबिंब प्रस्तुत करनेवाली होती है। अगर सिनेमा समाज का दर्पण है तो लोकगीत समाज की सरल अभिव्यक्ति है, लोक के हृदय का सच्चा उद्गार है। जो शुद्ध प्रकृत अवस्था में स्वत: फूटता है। इसे परंपरा के बहुरंगी दायरे के बीच पनपता उल्लासमय संगीत भी कह सकते है। दिलचस्प है कि संगीत की इस दुनिया का विस्तार और विन्यास दोनों ही अलिखित है, मौखिक है।

हिंदी सिनेमा में लोक संस्कृति का जैसा दिव्य व अकृत्रिम रूप दिखाई पड़ता है, वह आमजन के सांस्कृतिक उदात्त की कहीं न कहीं छाया है। लोकगीतों ने सिनेकथा को भाषा तो दी ही है, अभिव्यक्ति की लय भी दी है। इस सांस्कृतिक जुड़ाव का एक पक्ष यह है कि लोकगीत हृदय की वाणी है, जो हिंदी सिनेमा के साथ और जीवंत हो गई है। इससे इसके लोक प्रसार का दायरा भी बढ़ा है। युवा पीढ़ी में लोकगीतों के प्रति आकर्षण बढ़ाने में भी इसका बड़ा हाथ है।

लोक भावनाओं की दुनिया
हिंदी सिनेमा ने अपनी रागात्मक अभिव्यक्ति में लोकगीतों को शामिल कर हमारे उन बुजुर्गों की वाणी को स्थान दिया है, उनकी आवाज को नया संसार दिया है। इस तरह हमारी लोक अस्मिता और संस्कृति पुन: सृजित होती रही है। चक्की पिसते समय, धान कुटते समय, मवेशी चराते समय और ऐसे ही दूसरे श्रम करते समय खासतौर पर महिलाओं ने लोकगीतों के जरिए जिस तरह से सहनशक्तिपाई है, अनुभूति और अभिव्यक्ति का यह प्रदेय अद्भुत है। इससे आगे जन्म, मुंडन, यज्ञोपवित, विवाह, पर्व-त्योहार से लेकर प्रेम, उल्लास, लालसा, वासना, घृणा और स्नेह के अनगिनत क्षणों में हृदयगत भावनाओं को जाहिर करने वाले ये गीत एक ऐसा साथ है, जिसके बिना भारतीय लोक समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। भावनाओं की इस रागात्मक दुनिया के मर्म को हिंदी सिनेमा ने बहुत पहले पहचान लिया था। पहचान का यह सिलसिला श्याम-श्वेत के जमाने से शुरू होकर व्यावसायिक फिल्मों के कुबेरी कीर्तिमान तक बदस्तूर जारी है।

हिंदी मन और बोली
हिंदी भाषा की खासियत यह है कि उसकी पूरी निर्मिति बोलियों पर आधारित है। क्षेत्र से लेकर जलवायु तक विविधता के व्यापक मिश्रण ने हिंदी के मन-मिजाज को गढ़ा है। ऐसे में हिंदी सिनेमा के लिए विविधता की इस छटा को कायम रख पाना पहले दिन से एक चुनौती रही है। इसके लिए जहां अलग-अलग क्षेत्र और समाज की कहानियों पर फिल्में बनीं तो वहीं हर क्षेत्र और बोली से जुड़े लोकगीतों को भी कभी सीधे तो कभी कलात्मक प्रयोग के साथ अपनाया गया। हिंदी-सिनेमा के साथ लोकगीतों के संबंध का सांस्कृतिक के साथ व्यावसायिक और सांस्कृतिक पक्ष भी है। ऐसी फिल्मों की कतार बहुत लंबी है, जिनकी कामयाबी में लोकगीतों का बड़ा योगदान है। तीसरी कसम, रेशमा और शेरा, नागिन, एक मुसाफिर एक हसीना, सेहरा, अनपढ़, ताजमहल, गंगा जमुना, नदिया के पार, लम्हे, रुदाली आदि कई ऐसी फिल्में हैं जिनकी पहचान लोक टेर से है।

सिनेमा, संगीत और पहचान
दरअसल, लोकगीतों के बिना हिंदी सिनेमा की कल्पना ही अधूरी है। नौशाद, सी रामचंद्र, जयदेव, एसडी बर्मन से लेकर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल तथा अब शंकर एहसान लाय और एआर रहमान तक संगीतकारों की भरी-पूरी पात है, जिन्होंने लोकगीतों के बूते सिने संगीत की पूरी एक दुनिया रच डाली है। किसी ने गोवा के समुद्र तटों से लोक संगीत की सजलता ली तो किसी ने राजस्थान और पंजाब की लोक परंपराओं से मन को छू जाने वाले धुनों को नए सिरे से पिरोया। इस दुनिया को आबाद करने में इन संगीतकारों को शैलेंद्र, पंडित नरेंश शर्मा, कैफी, मजरूह, शकील, एसएच बिहारी जैसे गीतकारों का भी अक्षर साथ मिला।

गौरतलब है कि हालीवुड की ज्यादातर फिल्मों में गीत नहीं होते जबकि भारतीय और खासकर हिंदी सिनेमा बगैर गीत-संगीत के पूरा ही नहीं होता। हालीवुड में संगीत की एक समांतर दुनिया है जबकि भारत में सिनेमा और संगीत का साथ ऐसा गाढ़ा है कि इसने क्षेत्र, परंपरा और संस्कृति के दायरों को एक ऐसे समुद्र में मिला दिया, जो अलगाव के बीच सांस्कृतिक एकता के संदेश की तरह है। एक ऐसे दौर में जब संस्कृति के कई सुलेख विस्मृति की कोख में समाते जा रहे हैं, सिनेमा और लोकगीतों की साझी दुनिया में बहुत कुछ बचे होने का भरोसा एक ऐसी उपलब्धि है, जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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